बुधवार, 28 अगस्त 2019

शोध की अवधारणा


शोध की अवधारणा
                                                 डॉ. अवधेश कुमार पान्डेय
                                                          
      शोध नाम की कोई विधा नहीं है। शोध व्यवस्थित ढंग से किसी पक्ष का अध्ययन है। अनुसंधान का कोई निश्चित स्वरूप नहीं है और न ही शोध को किसी तकनीकी परिभाषा में बांधा जा सकता है। अनुसंधान का मूल तत्व है - तथ्यों की नवीन व्याख्या और अपनी दृष्टि की विशिष्टता। शोध जिज्ञासा की अनन्त यात्रा का नाम है। जिज्ञासा मनुष्य को हर क्षेत्र में होती है। अपनी इस जिज्ञासा यात्रा को जो कि अनियन्त्रित होती है; उसे किसी एक सवाल या विषय तक केन्द्रित करके उससे संबंधित यथासंभव समस्त प्रश्नों की एक श्रृंखला बनाकर उससे संबंधित यथासंभव सभी उत्तरों की खोज एवं आलोचनात्मक विवेक के साथ छानबीन करने का नाम शोध है। प्रश्न हवा में नहीं बनते हैं। ज्ञान की एक परम्परा जो पहले से चली आ रही है या उस विषय पर पहले जो चिन्तन हो चुका है; शोधकर्ता उन तथ्यों का विश्लेषण करे, उन प्रश्नों से संबंधित अपनी सहमति-असहमति दर्ज करे और उस परम्परा को आगे बढाए। पीछे वाले जो बोल चुके हैं उसका ज्ञान आपको होगा तभी आगे बढ़ पाएंगे।
      समस्त तथ्यों को एक जगह संकलित कर देना शोध नहीं है। शिवसिंह सरोज में पांच हजार कवि संकलित हैं जबकि शुक्ल जी के इतिहास में पांच सौ, बावजूद इसके शुक्ल जी की पुस्तक इतिहास है, शोध है और शिवसिंह सरोज की पुस्तक संकलन मात्र है। शोध मे अपना दृष्टिकोण शामिल होता है, तथ्यों की नवीन व्याख्या शामिल रहती है। शोध में अध्यायों की संख्या नियत नहीं होती है। विषय प्रवेश में अपने विषय के इतिहास या अतीत की झलक देनी पड़ती है। यह एक तरह से प्रस्तावना है, विषय में प्रवेश करने की युक्ति। हर अध्याय के अन्त में हम अध्याय का सार दे देते हैं। शोध में हम भूमिका, विषय प्रतिपादन, उपसंहार, परिशिष्ट, सन्दर्भ सूची, मूल ग्रन्थ, सहायक ग्रन्थ आदि देते हैं। लेखक के नाम से अकारादि क्रम तय होता है। पुस्तकों के क्रम में प्रकाशन वर्ष को वरीयता प्राप्त है। परिशिष्ट के अन्तर्गत हम उन सामाग्री को देते हैं जिनको हम मूल ग्रन्थ में नहीं दे सके। इसमें इन्टरव्यू वगैरह दिया जाता है। पुराने कवि और लेखकों की हस्तलिपि या लेख इसमें दे सकते हैं। तत्काल उपलब्ध या नवीनतम उपलब्ध सामाग्री इसमें दी जाती है।
      भूमिका शोध ग्रन्थ का आदि भाग होती है। इसमें तमाम सामाग्री जो इस विषय पर पहले काम हो चुका है; उनका जिक्र व उनके दृष्टि की विवेचना व विषय चुनाव का कारण व अपनी दृष्टि की विशिष्टता बतायी जाती है। पहले हुए शोध से आपके काम और दृष्टि में अन्तर एवं आपकी दृष्टि विशिष्ट क्यों है? स्पष्ट की जाती है। भूमिका आपके शोध विषय से सीधे जुड़ी होनी चाहिए। भूमिका बहुत लम्बी नहीं होनी चाहिए। भूमिका के बहाने आप अपने विषय के इर्द-गिर्द बात कर सकते हैं। गाने के पहले जो धुन की भूमिका होती है जो आपको गाना सुनने के लिए प्रेरित करती है वही शोध में भूमिका की भूमिका होती है।
     शोध के लिए जरुरी है कि आपकी प्रवृत्ति शोध की हो यानि आपके मन में प्रश्न उठते हों। डॉ. नगेन्द्र भी मानते हैं कि ‘आलोचनात्मक प्रतिभा के बिना शोध नहीं हो सकता।’ शोध करते समय शोधकर्ता को परिप्रेक्ष्य का ध्यान रखना चाहिए। परिप्रेक्ष्य बदलने से साहित्य के पूरे निष्कर्ष बदल जाएंगे शुक्ल जी इतिहास लिखते समय हिन्दू जाति को केन्द्र में रखते हैं और हजारीप्रसाद द्विवेदी लोक परम्परा को। जाहिर है परिप्रक्ष्य अलग होने से दोनों के साहित्य संबंधी निष्कर्ष अलग-अलग हैं।
    शोध की एक समस्या यह भी है कि एक पठनीय पुस्तक के साथ-साथ कम से कम दस अपठनीय, कुलिखित, कुसंपादित, किताबें छापी जा रही हैं। यह तय है कि पुस्तक की गुणवत्ता का उतना महत्व नहीं है जितना प्रकाशक के विक्रय तन्त्र का है। ऐसे में शोधकर्ता की ही जिम्मेदारी है कि वह अपठनीय पुस्तकों से अलग हो।
     साहित्य का प्रथम साक्षात्कार कथ्य से होता है, रूप छिपा रहता है। यदि कामायनी को रूपक माना जाए तो कौन किसके प्रतीक हैं? कामायनी का उद्गम स्रोत कहां है? क्या इसका संबंध वर्तमान से है? इन सबकी छानबीन भी शोधकर्ता को करनी चाहिए। किसी भी इतिहास का लक्ष्य अतीत का वर्णन करना नहीं होता। अतीत का वर्णन एक माध्यम होता है। इतिहास अतीत की मुर्दा जानकारी मात्र नहीं है। इतिहास के माध्यम से वर्तमान और भविष्य को संवारा जा सकता है। इसलिए इतिहास का प्रयोग शोध में काफी सचेत होकर करना चाहिए।
     शोध में विचारधारा का क्या महत्व है? क्या कोई विचारधारा साहित्यिक श्रेष्ठता का प्रमाण है? विचारधारा मूल रुप से गतिशील विचारों की एक सारिणी है। कुछ लोग तो यह मानकर चलते हैं कि विचारधारा ढलुआ वस्तु है और उसे वे जड़ बना देते हैं जबकि कोई भी विचारधारा स्थिर नहीं होती है। विचार भावों का विवेक सम्मत परिष्कृत रूप है। भाव की भित्ति पर ही विचार संभव है। भाव विचार की तुलना में अस्थाई होते हैं। भावों की तरह विचार भी बदलते हैं। फर्क यह है कि भाव जल्दी बदलते हैंविचार देर से। विचार में द्वन्द भी होता है। अनेक विचार एक श्रंखला बनाते हैं। विचार ही धारा के रूप में विकसित होती है। एक विचारधारा का पतन दूसरी विचारधारा के उदय में खाद का काम करता है। कोई भी विचारधारा साहित्यिक श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है। जो यह जानता है कि क्या नहीं लिखना चाहिए; वह महान रचनाकार है। इसके पीछे उसकी विचारधारा होती है। अनुसंधानकर्ता को सिद्धांतों की जांच-पड़ताल, परीक्षण और विश्लेषण किए बगैर नहीं स्वीकारना चाहिए।
      साहित्य में नए तथ्यों का महत्व उतना नहीं है जितना कि उन तथ्यों की व्याख्या का है। तथ्यों से एक गहरी दृष्टि मिलती है। वास्तुनिष्ठ तथ्य जैसी कोई चीज नहीं होती है। इतिहास और यहां तक विज्ञान में भी शुद्ध आब्जेक्टिविटी नहीं होती है। सब्जेक्टिविटी और आब्जेक्टिविटी में द्वंदात्मक संबंध होता है। साहित्यकार या इतिहासकार की दृष्टि महत्वपूर्ण होती है। तथ्य साहित्यकार के अपने चुनाव अपनी जरूरतों को प्रतिबिम्बित करते हैं।
      शोधार्थी को सबसे पहले उसका विषय स्पष्ट होना चाहिए। उसकी सीमा और कालखंड भी स्पष्ट होना चाहिए। विषय सार्थक और महत्वपूर्ण होना चाहिए। रिसर्च के केन्द्र में कौन-कौन प्रश्न होंगे? इस विषय पर और लोगों ने क्या काम किया है? आधार ग्रंथ क्या होंगे? सहायक ग्रंथ क्या होंगे? इन सबकी एक सूची शोधकर्ता के पास होनी चाहिए और यह सब उसे स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए।
       शोधार्थी को उपसंहार में अलग-अलग अध्यायों की पुनर्स्थापना करनी चाहिए। परिशिष्ट में अप्रकाशित और नई चीजें देनी चाहिए। शोधार्थी को अनुमानतः, संभवतः, शायद जैसे पदों से बचना चाहिए क्योंकि शोध की अनिवार्य शर्त है- तथ्यपरकता। शोधार्थी को हर चीज का सरलीकरण और अनुवाद करने से बचना चाहिए। जैसे ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई।’ इस पंक्ति का अनुवाद नहीं किया जा सकता क्योंकि गिरधर का कांसेप्ट दूसरी भाषा में नहीं है। शोध में मौलिकता और सूक्ष्मता होनी चाहिए। तथ्यों को अधिक से अधिक जमा करने से ज्यादा जोर उसकी व्याख्या पर होना चाहिए। नये तथ्य न भी मिल सकें तो हर्ज नहीं पर पुराने तथ्यों की नवीन व्याख्या होनी चाहिए। अंत में यही कहा जा सकता है कि शोध और जिज्ञासा मनुष्य स्वभाव के अंग हैं। ज्ञान के विकास के लिए शोध अत्यंत आवश्यक है।


सहायक ग्रंथ-
1 विनय मोहन शर्मा - शोध प्रविधि
  ,नेशनल पब्लिशिंग हाउस दिल्ली - 1980
2 डॉ. नगेन्द्र - शोध और सिद्धान्त, नेशनल पब्लिशिंग हाउस  नई दिल्ली - 1978
3 नामवर सिंह - इतिहास और आलोचना, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली दूसरा संस्करण - 1962


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