रविवार, 22 जून 2025

नाथ पंथ, Nath

 

नाथ संप्रदाय

डॉ. अवधेश कुमार पाण्डेय

      नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक गोरखनाथ को माना जाता है। नाथ पंथ में ‘गोरखनाथ’ शिव के रूप माने जाते हैं। अतः यह शैव संप्रदाय है। गोरखनाथ ने पतंजलि के योग को लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया और ब्रह्मचर्य, वाकसंयम, शारीरिक-मानसिक शुचिता तथा मद्य-मांस के त्याग का आग्रह किया। ब्राहमणों के कर्मकांड एवं वर्णाश्रम व्यवस्था पर इन्होंने भी तीव्र प्रहार किया। उनका सिद्धांत था - 'जोई-जोई पिंडे सोई ब्रह्मांडे' अर्थात जो शरीर में है, वही ब्रह्मांड में है। इड़ा, पिंगला, नाद-बिंदु की साधना, षट्चक्रभेदन, शून्यचक्र में कुंडलिनी का प्रयोग आदिनाथों की अंतस्साधना के मुख्य अंग हैं। संधा भाषा या उलटबांसी की शैली का प्रयोग इन्होंने भी किया है।

      सिद्ध संप्रदाय में जिस तरह भोग की प्रधानता आ गयी थी। उसका तिरस्कार करते हुए नाथपंथियों ने संयम और त्याग की वृत्ति को अपनाया। व्रजयान से जिस प्रकार सिद्ध संप्रदाय विकसित हुआ। उसी प्रकार सहजयान से नाथ संप्रदाय विकसित हुआ। नाथ पंथ की दार्शनिकता सिद्धांत रूप में शैव मत के अंतर्गत है और व्यवहारिकता की दृष्टि से हठयोग से संबंधित है। ईश्वर को यह ‘शून्य रूप’ में मानते हैं जिसे वे ‘अलख निरंजन’ कहते हैं। वे इन्द्रिय निग्रह पर विशेष बल देते हैं और नारी से दूर रहने की शिक्षा देते हैं। मन की स्वाभाविक वृत्ति को बाह्य जगत से पलटकर अंतर्जगत की ओर करना ही सबसे बड़ी साधना है। नाथ साहित्य में कुंडलिनी योग तथा उससे जुड़े पारिभाषिक शब्दों – ‘ब्रह्मरंध्र, षडचक्र, अनहदनाद, इड़ा-पिंगला' का प्रचुरता से प्रयोग हुआ है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार - "इस मार्ग में कठोर ब्रह्मचर्य, वाक् संयम, शारीरिक शौच, मानसिक शुद्धता, ज्ञान के प्रति निष्ठा, बाह्र आचरणों के प्रति अनादर, आंतरिक शुद्धि और मद्य-मांस आदि के पूर्ण बहिष्कार पर जोर दिया गया है।"

      नाथ परंपरा में मत्स्येन्द्रनाथ के गुरु जालंधरनाथ माने जाते हैं। कहा जाता है कि जालंधरनाथ पहले सिद्ध थे। नाथों में नौ नाथ प्रसिद्ध हैं –

1.       मत्स्येन्द्रनाथ

2.       गहनिनाथ

3.       ज्वालेन्द्रनाथ

4.       करणिपानाथ

5.       नागनाथ

6.       चर्पटनाथ

7.       रेवानाथ

8.       भर्तृनाथ

9.       गोपीचन्द्रनाथ

इस सूची में गोरखनाथ का नाम न आने का कारण यह बताया गया है कि गोरखनाथ ही अलग-अलग समय में अलग-अलग नामों से अवतरित हुए हैं। नाथ पंथ का प्रभाव हिंदुओं के साथ-साथ मुसलमानों पर भी था। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी कहते हैं - "इस मार्ग की सबसे बड़ी कमजोरी इनका रूखापन और गृहस्थ धर्म के प्रति अनादर भाव है।"

नाथ शब्द का शाब्दिक अर्थ है जो मुक्ति प्रदान करे। सिद्धों के विपरीत इनकी मान्यता है - मुक्ति के लिए ऐन्द्रिय भोग नहीं बल्कि इन्द्रिय संयम आवश्यक है। इन्होंने सिद्धों के प्रवृत्ति मार्ग के विरूद्ध निवृत्ति मार्ग की रचना की। गोरखनाथ कहते हैं –

“नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा।

ऐसे मन लै जोगी खेलै, तब अंतरि बसै भंडारा।।“

नाथों में एक विशेष प्रकार की साधना पद्धति पर बल दिया गया जिसे हठयोग कहते हैं। इसका अर्थ है योग साधना के माध्यम से '' अर्थात सूर्य और '' अर्थात चन्द्रमा का मिलन करा देना अर्थात इन्द्रियों के स्वभाव को पलट देना। इसके अंतर्गत कुंडलिनी जागरण तथा षट्चक्रभेदन आदि क्रियाओं की चर्चा की जाती है। नाथ कवि प्रतिबद्ध कवि नहीं हैं। वे केवल अपनी मान्यताओं के प्रचार के लिए कविता रचते हैं इसलिए इनके काव्य में शिल्प की बारीकियां नहीं दिखायी देती हैं। इनका काव्य रूप मुक्तक है। इनकी भाषा अपभ्रंस व पुरानी हिंदी के बीच की है जिसमें ब्रज, अवधी और पंजाबी के शब्द शामिल हैं।

अंतःसाधनात्मक अनुभूतियों को इन्होंने एक विशेष प्रतीकात्मक भाषा में व्यक्त किया जिसे संधा भाषा कहते हैं। इस भाषा में साधारण भाषा के विपरीत उक्तियां होती हैं जो प्रतीकों का अर्थ खुलने पर ही स्पष्ट होंगी - 'नाथ बोले अमृतवाणी, बरिसै कंम्बली भिजैगा पाणि।‘

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