आलोचकों की दृष्टि में कवि शमशेर
डॉ. अवधेश कुमार पान्डेय
शमशेर बहादुर सिंह ‘दूसरा तारसप्तक’ में संकलित, अज्ञेय की विचारधारा से प्रेरित, मार्क्सवाद से संचालित, नई कविता की चेतना से संपन्न, जनवादी कवि हैं। विचारों से मार्क्सवादी शमशेर, संस्कारों से व्यक्तिवादी और अनुभवों से रुमानी
हैं। मुक्तिबोध की मान्यता है - ‘‘शमशेर की मूल मनोवृत्ति एक इम्प्रेशनिष्टिक
चित्रकार की है। उन्होंने अपने हृदय में आसीन चित्रकार को पदच्युत कर, कवि को अधिष्ठित किया है।’’
‘महल खड़ा करने की इच्छा है शब्दों का
जिसमें सब रह सकें लेकिन साँचा
ईट बनाने का मिला नहीं है, शब्दों का मिला है।’
उपर्युक्त पंक्तियां शमशेर के यहां सबसे सटीक बैठती हैं। शमशेर अधिकतर चित्रों
में सोचते हैं जो कई बार स्वयं अमूर्त होते हैं और कविता में स्थानांतरित होकर और
भी अर्मूत और सूक्ष्म हो जाते हैं। शमशेर बिम्बों में अपने को खोलते और बांधते आये
हैं। उनकी खड़ी बोली सबसे अधिक खड़ी है। भाषा शमशेर के यहां बोलती नहीं बल्कि देखती
है। शमशेर की कविता सामान्य पाठकों के समझ में नहीं आती; वह कवियों को ही समझ में आती है इसलिए शमशेर कवियों के कवि
हैं। शमशेर अपनी कविता में सूक्ष्म से संकेत करते हैं। ध्वनि या व्यंजना के माध्यम
से अपनी बात को अभिव्यक्त करते हैं। शमशेर की कविता में विचार भी रहते हैं लेकिन
वह मुख्य रुप से हमारी संवेदना को विकसित करते हैं।
शमशेर की कविता की बनावट और बुनावट को समझने के क्रम में
अनेक आलोचकों ने शमशेर की कविता पर टिप्पणी की है। डॉ. नामवर सिंह कहते हैं - ‘‘शमशेर
की कार्यशाला सचमुच एक विशाल चित्रशाला है। रंगों का महोत्सव। कहीं ‘धूप आइने में
खड़ी’ है, कहीं ‘धूप थपेड़े मारती है
थप-थप। केले के हातों से पानी से। केले के थंबो पर।’ और कहीं ‘ऊषा के जल में सूर्य
का स्तंभ हिल रहा है।’ अकेले एक धूप के कितने-कितने रुप!‐‐‐इस चित्रशाला में इतने रंगों की लीला है, तरह-तरह के रंगों
की इतनी घुलावट है कि सबका विवरण देना लगभग असंभव है। हिंदी कविता में रंगो का ऐसा
महोत्सव दुर्लभ है। सचमुच ही ‘कवि घंघोल देता है। हिला-मिला देता है कई दर्पनों के
जल।’’1 आगे नामवर जी तो यहां तक कह देते हैं कि शमशेर की प्रायः सभी कविताएं एकालाप
हैं - आन्तरिक एकालाप। ‘‘बक रहा हूं जुनूं में क्या कुछ। कुछ न समझे खुदा करे
कोई’’ के अंदाज में। नामवर सिंह मानते हैं कि शमशेर सिर्फ कवि हैं। न ‘शुद्ध
कविता’ का कवि, न कवियों का कवि
औैर न प्रगति का कवि, कुछ कवि ऐसे होते
हैं जिन्हें हर विशेषण छोटा कर देता है।
प्रभाकर श्रोत्रिय लिखते हैं - ‘‘शमशेर मूलतः रोमानी कवि
हैं। स्वयं वे और उनकी कविताएं इसका ऐलान करती हैं‐‐‐शमशेर के कवि मूल में जो प्रेम है, वही विराट होकर मनुष्य की आत्मा का बहुविध सौंदर्य बना है, जिसकी जड़ में दुनिया की सारी हलचलें, अनुभूतियां, संघर्ष आ जाते हैं। क्योंकि सौंदर्य सुंदर ही नहीं है,
सुंदर की अनवरत तलाश है जिसमें असुंदर भी मिलता
है और हद तक‐‐‐। शमशेर बात तो प्रगतिशीलता की करते हैं और कविताएं रोमानी लिखते हैं।’’2 प्रभाकर श्रोत्रिय की इस स्थापना को हम शमशेर में अधिकांशतः
सही पाते हैं। शमशेर ‘कुछ और कविताएं’ में लिखते हैं -
‘‘आह तुम्हारे दाँतो से जो दूब के तिनके की नोक
उस पिकनिक में चिपकी रह गयी थी,
आज तक मेरी नींद में गड़ती है।’’
(कुछ और कविताएं,
पृ0 - 55)
‘ये नज़ाकत देखो आरिज़ उनके नीले पड़ गये; मैंने तो बोसा लिया था ख्वाब में तस्वीर का’! कुछ इसी तरह की नाजुक बयानी नींद
में गड़ने वाले दूब के तिनके पर शमशेर की पंक्तियों में है।
अशोक बाजपेयी लिखते हैं - ‘‘अज्ञेय ने पूर्व की एक परम्परा
के उत्तराधिकारी के नाते कहा था कि कविता भाषा में नहीं होती, वह शब्दों में भी नहीं होती, कविता शब्दों के बीच की नीरवताओं में होती है। ‐‐‐इसके बरक़्श शमशेर बहादुर सिंह की कविता कहे और अनकहे के बीच ठिठकी हुई कविता है।‐‐‐शायद किसी और कवि के मुकाबले शमशेर कहे गए से अधिक अनकहा छोड़ते हैं‐‐‐अर्थ कहे से नहीं बल्कि अनकहे से अधिक चरितार्थ होता है।’’3 शमशेर में ‘गैप्स
बिटबीन द लाइन्स’ का बड़ा महत्व है। शमशेर कोई भूमिका नहीं बांधते। शमशेर विचलन के
कवि हैं। अर्थ विचलन के कवि हैं। लीक से हटकर चलने वाले कवि शमशेर हैं। इनकी कविता
में अर्थों की चैह्द्दी बंधी हुई नहीं है। अर्थों का खुलापन है।
अशोक बाजपेयी कहते हैं कि ऐसी तमाम कविताएं आज मौजूद हैं जो
बिम्बों और रुपकों के साथ हैं। लेकिन इन रचनाओं की मौजूदगी के बावजूद शमशेर को
पढ़ना एक नई दृष्टि प्राप्त करना है। भाषा शमशेर के यहां बोलने से ज्यादा देखती है।
शमशेर अपनी कविता के माध्यम से हमारे रोजमर्रा के काम में शरीक होते हैं और जिंदगी
के गहनतम अनुभवों के साथ चलते हैं। शमशेर की कविता हार्दिक गरमाहट के लिए आज भी
बेजोड़ है। अपनी कविता की सामाजिक उपयोगिता के बारे में शमशेर को संदेह था। शमशेर
स्वयं कहते हैं कि अपनी काव्य कृतियां मुझे सामाजिक दृष्टि से बहुत मूल्यवान नहीं
लगती। उनकी वास्तविक सामाजिक उपयोगिता मेरे लिए एक प्रश्नचिन्ह सा ही रही है।
कितना ही धुंधला सही। शमशेर की इस शंका का निवारण तो शमशेर की एक कविता ही कर देती
है। शमशेर लिखते हैं -
‘शब्द का परिष्कार स्वयं दिशा है।’
शमशेर ठिठके नहीं हैं। उन्होंने हमारी संवेदना का विस्तार कर जिंदगी की तस्वीर
को पूरा करने का काम किया है। शमशेर मानते हैं कि हर कवि का मोटे तौर पर एक निजी
काव्य संसार होता है, जिसमें वह प्रायः
रमा सा रहता है। अगर ऐसा नहीं है तो वह वास्तव में कवि नहीं है। जरुरत इस बात की
है कि कवि अपने इस निजी काव्य संसार को निरंतर अधिक से अधिक समृद्ध करता चले। जो
भी विषयवस्तु या उस विषयवस्तु की जो दुनिया उसे आकृष्ट करती है, उसे अपनी भावनाओं में जितना भी अधिक मूर्त कर
सकता है, उसे करना चाहिए।
शमशेर की कविता को खोलने के लिए मलयज बहुत प्रासांगिक हैं।
मलयज अपने लेख ‘शमशेर और आधुनिक कविता’ में लिखते हैं - ‘‘शमशेर मूड्स के कवि हैं,
किसी विजन के नहीं। यह अवश्य है कि उनका ‘मूड’
उस व्यक्ति का मूड है जो हमारे आपके समाज में उसकी सम्पूर्ण विसंगतियों, बिड़म्बनाओं, यानि एक शब्द में ‘यथार्थ’ के बीच रहता है, उन्हें भोगता है और उन्हें जीता है।’’4 मलयज कहते हैं कि शमशेर की कविता किसी विचारधारा में बंधकर
नहीं चलती। शमशेर अपनी अभिव्यक्ति शैली के ऐसे स्थल पर खड़े हैं; जहां से वे नीचे उतरना नहीं चाहते बल्कि वे अपने
साथ अपने संवेदनशील पाठक को ऊंचा उठाकर एक अमूर्त, पारदर्शी, वर्णमय, लोक में ले जाना चाहते हैं। यह लोक वर्तमान युग
सत्य के तमाम हल्के-हल्के शेड्स के साथ कवि के मूड का लोक है। अपनी इस चेष्टा में
वे अपनी काव्यानुभूति का पूरा दायित्व निभाते हैं।
शमशेर अपनी कविता को किसी विज़न के तहत नहीं लिखते हैं बल्कि
उन्हें जब जो चीजें याद आती जाती हैं तो वे लिखते जाते हैं। शमशेर अपनी कविता में
नैतिक शिक्षा भी नहीं देते हैं। उनकी कविता सिर्फ कविता के लिए कविता है। शमशेर
अपनी ‘राग’ कविता में लिखते हैं -
‘‘मैंने शाम से पूछा
या शाम ने मुझसे पूछा
इन बातों का मतलब‐‐‐
उसने मुझसे पूछा, तुम्हारी कविताओं का क्या मतलब है?
मैंने कहा कुछ नहीं।
उसने पूछा - फिर तुम क्यों लिखते हो?
मैंने कहा ये लिख जाती हैं।’’
मलयज 9 सितम्बर 1967 को अपनी डायरी में लिखते हैं - ‘‘शमशेर का
जीवन जिस तरीके से अपने को व्यक्त करता है। उसमें कम्युनिज्म, उनके व्यक्तित्व का हाइली इमोशनल नेचर और कवि
का इगो होता है। इससे किसी व्यक्तिगत स्थिति घटना के प्रति उनकी प्रतिक्रिया इन
तीनों चीजों में रंग कर जाहिर होती हैं और आपस में इतनी उलझी हुई होती हैं कि यह
कहना मुश्किल हो जाता है कि उनके किस आशय-विशेष के पीछे कम्युनिज्म का प्रभाव है।
किसके पीछे उनका भावुक नेचर का और किसके पीछे उनका इगो बोल रहा है।’’5 मलयज कहते हैं कि बिम्बों के कवि को समझने के लिए, उसके काव्य का आस्वादन करने के लिए पाठक को
उसकी रचना प्रक्रिया को समझना पड़ता है। इस तरह से उसे सामान्य स्थिति से अधिक
चेष्टा करनी पड़ती है। बिम्ब वाली कविता में कभी-कभी कुछ बिम्ब अलग से आकर्षित करते
हैं। बिम्ब वाली कविता को समझ पाने का संतोष पाठक के सामने इतना बड़ा हो जाता है कि
कविता का अनुभव सिग्नीफिकेंट है या नहीं और इस तरह के दूसरे प्रश्न गौण हो जाते
हैं।
शमशेर विचारों और काव्य प्रवृत्तियों की अनवरत यात्राएं
करते हैं। इस यात्रा का व्यौरा यदि उन्हीं से लिया जाए तो काफी विषमता और
अंतर्विरोध दिखायी देगें। यथार्थवाद, अतियथार्थवाद, प्रतीकवाद,
प्रभाववाद, शिल्पवाद, मार्क्सवाद,
ही नहीं; समय-समय पर वे भिन्न-भिन्न रुचियों प्रवृत्तियों और विचारों,
के रचनाकारों से प्रभावित होने का खुला ऐलान
करते हैं। सामान्य रुप से यह बात लोंगो को हैरत में डाल देती है कि एक ही अनुच्छेद
में वे ‘मार्क्सवादी मॉडल’ अपनाने की बात भी करते हैं और रोमानियत को अपनी असली
जमीन बताते हैं और रहस्यवाद से प्रभावित होना भी स्वीकार करते हैं। 1980 में प्रकाशित ‘उदिता’ में वे कहते हैं: ‘उस
जमाने में (1941 से 1947)
के बीच मैंने अपनी घोर वैयक्तिक अतार्किक
भावुकता, रोमानी आदर्शवाद आदि से
रचनात्मक संघर्ष शुरु किया, और मार्क्सवादी मॉडल
प्रबल रुप से मुझे अपनी ओर खींच रहा था। उर्दू कविता का शानदार प्रगतिशील उभार भी
प्रभावित कर रहा था। धीरे-धीरे मगर काफ़ी धीरे-धीरे कुछ परिवर्तन आया। पर मेरी असली
जमीन तो रोमानी थी, रोमानी ही बनी
रही; जिसमें इक़बाल और शेली का,
अरविंद, निराला और रवीन्द्रनाथ के छायावादी या रहस्यवादी अद्वैत की
छाया भी कहीं न कहीं शामिल थी।’
एक ओर यह था और दूसरी ओर शमशेर अपने कवि की स्वत्रंत्रता की उद्घोषणा ‘कुछ और
कविताएं’ की भूमिका में इन शब्दों में करते हैं - ‘मेरे कवि ने कभी किसी फ़ार्म,
शैली या विषय का सीमाबंधन स्वीकार नहीं किया।
फ़ैशन किन विषयों पर लिखने का है या किस वाद का युग आ गया है या चला गया है। मैंने
कभी इसकी परवा नहीं की। जिस विषय पर जिस ढ़ंग से मुझे रुचा, मन जिस रुप में भी रमा, भावनाओं ने उसे अपना लिया; अभिव्यक्ति अपनी ओर से सच्ची हो, यही मात्र मेरी कोशिश रही। उसके रास्ते में किसी भी बाहरी
आग्रह और आरोप या अवरोध को मैंने सहन नहीं किया।’
‘डॉ. राम दरश मिश्र’ शमशेर के विषय में लिखते हैं - ‘‘इनकी
अतिशय व्यक्तिवादिता केवल अपने प्रति प्रतिबद्ध होने के कारण पाठको की समझ की
उपेक्षा कर जाती है और ऐसे-ऐसे महीन जाल बुनती हैं तथा खन्डित बिंबो की योजना करती
हैं कि पूरी कविता अपने अभिप्रेत प्रभाव के साथ उभर नहीं पाती। शमशेर बहुत सूक्ष्म
सौंदर्य-बोध के कवि माने जाते हैं किंतु कठिनाई यह है कि सौंदर्य यहां-वहां की कुछ
पंक्तियों में अलग-अलग ढ़ंग से उभरकर रह जाता है।’’6 डॉ. राम दरश मिश्र मानते हैं कि शमशेर की कविताओं का
अधिकांश स्वर कुंठित प्रेम का है। शमशेर अनुभव को नया रुप देने के स्थान पर उलझा
देते हैं।
नई कविता जिस देखे भोगे जीवन को काव्य विषय बनाती है;
कवि भी सिर्फ उसे ही रचता है जो उसके अनुभव के
पकड़ में आ जाता है। प्रगतिवादी कवियों की तरह ये कवि नई कविता के कवि मजदूर के नाम
पर देश-विदेश का कुलाबा नहीं मिलाते। ये तो उसे रचते हैं जिसका वे साक्षात्कार
करते हैं। एक गैर रुमानी दुनिया के बीच यह स्वअर्जित हठी रोमान है - ‘डबडबाई आँखों
में सितारों भरे आसमान को पा लेने की चाह जैसा; लेकिन जिसे वास्तविकता में पा सकना मानो मौत की प्रतीक्षा
करना है। फिर भी कवि है, जो इसे किसी भी
कीमत पर, इंतिहाई हद तक, पाना चाहता है -
‘‘मुझको प्यास के पहाड़ों पर लिटा दो जहाँ मैं
एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ।
मुझको सूरज की किरनों में जलने दो -
ताकि उसकी आँच और लपट में तुम
फ़ौव़ारे की तरह नाचो।’’
(शमशेर की ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ कविता से)
‘छाठवां दशक’ पुस्तक में विजयदेव नारायण साही शमशेर की कविता
की बनावट और बुनावट को इस रुप में पेश करते हैं - ‘‘शमशेर की सारी कविताएं यदि
शीर्षक हीन छपें, या उन सबका एक ही
शीर्षक हो ‘सौंदर्य’, शुद्ध सौंदर्य,
तो कोई अंतर नहीं पड़ेगा। शमशेर ने किसी विषय पर
कविताएं नहीं लिखीं हैं। उन्होंने कविताएं सिर्फ कविताएं लिखी हैं, या यों कहें एक ही कविता बार-बार लिखी है।
शमशेर इस पल-छिन अवतार लेते हुए सौंदर्य के गवाह हैं - ऐसे गवाह जिसने इस अवतार के
हर रंग और हर विस्तार को उसके ‘अनन्तलीला’ रुप में स्पृहा के माध्यम से ठीक-ठीक
स्वायत्त करने की सपथ ली हो।’’7 विजयदेव नारायण
साही लिखते हैं; शमशेर की कविताएं
दुरुह तो हैं ही। बल्कि हिंदी में ये सर्वाधिक दुरुह कविताएं हैं। इनके यहां छंद,
लय, शब्दावली आदि विविध क्षेत्रों में नये-नये प्रयोग देखने को मिलते हैं। मलार्मे
से इनके कवि जीवन के संघर्षो की तुलना भी की गयी है। इनके काव्य में सहसा ऐसे शब्द
साथ-साथ आने लगते हैं जिनके साहचर्य की पहले कल्पना ही नहीं की गयी थी, जैसे - ‘सांस की गंगा’, ‘हंसी के फूल’, ‘मौत के रंगीन पहाड़’, ‘अगोरती विभा’,
‘कागजी विस्मय’, ‘सुलगता हुआ पहरा’, आदि। ऐसे प्रयोग उनकी कविता को नए अर्थवत्ता से अनुप्राणित कर देते हैं। साही
जी स्वयं कहते हैं - ‘कविता शब्दों और शब्दों के संयोग से नहीं बनती, बल्कि शब्दों का जाल जो यथार्थ पर फेंका जाता
है, उससे बनती है।’
शमशेर कविता में पेंटिग की शुरुवात करते हैं। कविता में
शब्दों के स्थान पर यदि हम रंग रख दें तो हम शमशेर तक पहुंच सकते हैं। शब्दों के
संदर्भ में शमशेर बहुत कृपणता बरतते हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी लिखते हैं - ‘शमशेर जब
कविता रचते हैं तब जैसे राजमिस्त्री बहुत कम मसाला रह जाने पर भवन का निर्माण करता
है, वैसे ही शमशेर भी अपना
स्थापत्य रचते हैं।’ नागार्जुन बहुत (vocal poet) हैं। कभी-कभी
वे बहुत Loud
हो जाते हैं। शमशेर कविता
में बहुत Loud होना पसंद नहीं करते
क्योंकि Loud
कविता दीर्घजीवी एवं
उम्रदराज नहीं होती है।
शमशेर की कविता के बारे में नंदकिशोर नवल की टिप्पणी बहुत
महत्वपूर्ण है। नंदकिशोर नवल लिखते हैं - ‘‘शमशेर के कवि मानस की बनावट अत्यंत
जटिल है। उसमें प्रेम है तो सौंदर्य भी, मनुष्य है तो प्रकृति भी, व्यक्ति भी है तो
समाज भी और देश है तो संसार भी। ये सब उनमें परस्पर घुले-मिले हैं और उसी रुप में
उनकी कविताओं में अभिव्यक्त होते हैं। ‐‐‐इसी कारण शमशेर हिंदी के प्रगतिशील कवियों में ही नहीं, सभी आधुनिक कवियों में अत्यंत विशिष्ट कवि
हैं।’’8
शमशेर संश्लिष्ट अनुभूतियों के कवि हैं। इसी के
परिणामस्वरुप वे समाज की भी कविता लिखते हैं तो हमें उसमें उनके व्यक्ति मन की
पीड़ा और अकेलापन देखने को मिलता है। इसी तरह उनकी प्रेम कविता का भी एक सामाजिक
संदर्भ होता है। उनका प्रेम कोई आध्यात्मिक वस्तु नहीं है। वह इसी समाज के भीतर,
इसी समाज के व्यक्ति विशेष के प्रति उत्पन्य
हुआ है। इसी कारण वह क्रूरतम और कटुतम है। शमशेर की कविता की विशेषता उसकी
लयात्मकता, उसकी भाषा और उसका
चित्रविधान है। रुप-शिल्प संबंधी विविधता हमें अन्य कवियों में भी मिलती है,
पर लय का जैसे सूक्ष्म प्रयोग शमशेर ने अपनी
कविता में किया है, वैसा हिंदी के और
किसी कवि ने नहीं।
एक कवि के रुप में शमशेर को समझने के क्रम में प्रबुद्ध आलोचक
और कवि ‘कुंअर नारायण’ शमशेर बहादुर सिंहः ‘इतने पास अपने’ लेख में लिखते हैं -
‘‘शमशेर को पढ़ना केवल उनकी कविताओं के अर्थ ग्रहण करना नहीं है, रचनात्मकता के अर्थ को भी अनुभव करना है।
स्थितियां, बातें या प्रभाव, उनकी भाषा से उत्पन्य होते हैं, उसमें अलग से रखे हुए नहीं लगते इसलिए उनकी
कविताओं के निष्कर्ष नहीं, उन निष्कर्षो तक
ले जाने वाली भाषा ज्यादा बड़ा काव्यानुभव होती है। उस वक्त भी जब लगता है कि कवि
किसी खास शब्द या बिम्ब या कथन को टटोल या आंक रहा है। वह हम तक जिंदगी और भाषा को
लेकर एक गहरी चिंता और दायित्व के बोध को संप्रेषित सा करता है। ऊपर से उद्वेलित
लगती उनके काव्य भाषा की सतह के नीचे एक अनुशासन भी सक्रिय रहता है - सतर्क,
संवेदनशील, शिक्षित और उत्सुक - जिसकी जड़े मनुष्य और उसकी संस्कृति में
कहीं गहरे जगह रखती हैं।’’9 उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी साहित्य के गम्भीर अध्येता
होने के नाते शमशेर तीनों काव्य परंपराओं से पूरी तरह परिचित हैं तथा तीनों की कभी
सहज, कभी जटिल बुनावट उनकी
काव्य भाषा का खास रंग है। शमशेर उन कवियों में से हैं जो कविता के स्वरुप शिल्प
(फार्म) को महत्वपूर्ण मानते हैं और उसको लेकर बराबर प्रयोगशील रहे हैं। इसलिए
शमशेर उनके लिए दुरुह कवि साबित होते रहे हैं जो कविता में सीधे-सादे कथन को पहली
जरुरत मानते हैं।
डॉ. रामस्वरुप चतुर्वेदी ‘हिंदी काव्य का इतिहास’ में लिखते हैं - ‘‘कविता
संगीत और चित्रकला की एक अद्भुत त्रिवेणी शमशेर के यहाँ प्रवाहित है। एक ओर
चित्रकला की आकृति उभरती है और वह संगीत की अमूर्तता में डूब जाती है। यों
चित्रकला, संगीत और कविता घुल-मिल
कर रचना संभव करते हैं।’’10
‘हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास’ शीर्षक साहित्येतिहास
ग्रंथ में चतुर्वेदी जी कहते हैं कि शमशेर के यहां संज्ञा शब्दों सें अधिक महत्व
क्रियापदों, सर्वनामों और अवयवों का
है। शमशेर के यहां बिंबो की सादगी कुछ वैसे ही विद्यमान है, जैसे छायावादी अभिजात्य का बिंब वैभव प्रसाद के यहां दिखता
है। शब्दों, बिंबो, ध्वनियां, अर्थों की अनुगूंजों आदि के सांकेतिक या निर्देशात्मक
इस्तेमाल द्वारा शमशेर एक पैना प्रभाव उत्पन्य करने की विचित्र क्षमता रखते हैं।
उनकी कविताओं को एक विशेष अर्थ में शब्द रचनाएं कहा जा सकता है। मानों शब्द भाषा
के नियमों से बंधे नहीं उसमें खुले पड़े हैं -ः
‘‘सारी दुनिया भीग रही है,
नये नये हैं बादल।
वह कोना खाली है देखो-देखो!
सिर पर हैं यह स्मृतियों के दल के दल!
साधु बताओ! संत बताओ!
पी है, ऐसी बूँदे पी
है!’’11
‘डॉ. बच्चन सिंह’ लिखते हैं कि शमशेर के प्रयोगवाद का रथ संवेदना का धरातल नहीं
छोड़ता। शमशेर अपनी निजी अनुभूतियों, उनकी बारीक बुनावट और प्रायः दुरूहता के कारण भी लोगों का ध्यान आकृष्ट करते
हैं। उनकी कविताएं मानसिक जटिलता की कविताएं हैं। वे भीतर और भीतर घुसते जाते हैं,
यहां तक कि अचेतन मन की सीमाओं में भी प्रवेश
कर जाते हैं। वे त्रिलोचन की तरह सब कुछ कह देने और पूरा वाक्य लिखने के पक्ष में
नहीं हैं। वे बिंबो को शब्दों को अनायास बिखेर देते हैं। इस बिखराव को वे विराम,
अर्धविराम, डैश, डाट से नियंत्रित
करने की चेष्टा करते हैं। डॉ. बच्चन सिंह आगे लिखते हैं - ‘‘वे मुख्यतः प्रेम और
प्रकृति सौंदर्य के कवि हैं - कहीं दोनों अलग हैं और कहीं दोनों का अदभुत रासायनिक
घोल है। अपने चित्रों को बनाने में वे अनेक रंगो का प्रयोग करते हैं। रंग कई हैं -
पर एक भी रंग चटकीला नहीं है - सब किंचित मटमैले, धुंधले, सांवले, उदास। कहीं गुलाबी है तो उसका रंग कत्थई है‐‐‐रंगों के मिश्रण या कंपोजीशन का क्या कहना? उन्हें उसकी अनेक विधियां
मालूम हैं।’’12
विष्णु चंद्र शर्मा शमशेर के काव्य की बुनावट के बारे में
लिखते हैं - ‘‘शमशेर प्राचीन और नवीन, पश्चिम और पूर्व के यथासंभव निर्दोष शिल्प के उच्चतम स्तर के सच्चे कवि हैं।’’13
डॉ. रामविलास शर्मा लिखते हैं कि - ‘‘अंग्रेजी कवियों में
कीट्स और हिंदी कवियों में गिरिजा कुमार माथुर की सी सघन ऐन्द्रियता शमशेर में है
लेकिन वह मूर्तिकार नहीं हैं कि अंग प्रत्यंग गढ़कर रख दें, न वह ‘कीट’ कवि हैं कि वीभत्स में ही उनका मन रहे, न वह ‘‘ऐब्स्ट्रैक्ट आर्ट वाले हैं कि
ज्यामितीय की रेखाओं में नारी का रूप खो जाय‐‐‐इम्प्रैशनिष्ट चित्रकार भी सौंदर्य ऐसी उड़ती निगाह से नहीं देखते जैसे शमशेर।’’14 शमशेर की ‘बात बोलेगी’ कविता का मुखड़ा मानो ‘नई कविता’ का
मुखड़ा बन गया था। शमशेर की यह काव्य पंक्ति गोया ‘नई कविता’ के मेनीफेस्टो और
घोषणा पत्र के बीज वाक्य की तरह सबकी जुबान पर चढ़ गई।
शमशेर की कविताओं का शीर्षक बहुत व्यंजक होता है और पूरी कविता की कुंजी लिए
होता है। शमशेर की कविताएं आपको बांधती नहीं हैं। शमशेर की कविताएं हमारे साथ चलते
हुए हमारे अनुभव का अंग बन जाती हैं। इस कड़ी में हमारे समय के सबसे महत्वपूर्ण
आलोचक डॉ. नामवर सिंह कहते हैं - ‘‘रंग और रेखाओं की बारीकी के चित्रकार शमशेर के
यहां परस्पर मिले-जुले विभिन्य ऐन्द्रिक बोध वाले अनेक चित्र मिलेंगे। यदि एक ओर
-ः
मकई से
लाल गेंहुए तलुए
मालिश
से चिकने हैं?
सूखी भूरी झाड़ियों में
व्यस्त
चलती फिरती पिंडलियां‐‐‐
जैसा उत्तेजक वर्ण-चित्र है, तो दूसरी ओर -
यह
समुंदर की पछाड़
तोड़ती
है हाड़ तट का
अति
कठोर पहाड़
भयंकर नाद-चित्र और तीसरी ओर इन सबका मिला-जुला ऐन्द्रिय चित्र -
पहाड़ पथ्थर की पीठ पर सांप केंचुली
उतारता रहा;
लहर जहां कांस में,
सिवार में पेट उचकाती - सी अंडो के
छिलके
उतारती सी‐‐‐
प्रयोगवादी कवियों में शमशेर की वाक्य योजना सबसे विलक्षण है। शमशेर वाक्य
नहीं प्रायः शब्द लिखते हैं; वे ग्राफ पेपर पर
जैसे बिंदु निश्चित करते हैं जिन्हें मिलाने का काम पाठक के ऊपर रहता है। जैसे-
गाएं मैली सफेद काली
भूरी।
पथ्थर
लुढ़क पड़े। पेड़ स्थिर नीरव।
दो पहाड़ियां धूम - विनिर्मित
पावन।’’15
शमशेर के काव्य में व्याख्या की अनंत संभावनाएं विद्यमान हैं। कविता शमशेर में
बसती थी, पूरी अस्मिता में;
मन की गहन अटूट रक्तधारा में, तन की तनहा बस्ती में, सृष्टि के निर्वस्त्र सौंदर्य को कला के अंग रागों से
सुवासित करने वाले आचरण में, आंख में, रग-रग में। प्रभाकर श्रोत्रिय की टिप्पणी शमशेर
पर सबसे सटीक बैठती है। श्रोत्रिय जी लिखते हैं - ‘आधुनिक कविता में एक ऐसा कवि भी
था जिसके आगे आलोचना के सारे धड़े अपनी अहम्मन्यता छोड़कर निरपवाद नतसिर थे‐‐‐शमशेर तो राग कवि थे, अपने मूल स्वाभाव में रोमैंटिक‐‐‐अकादमिक रूढ़ आलोचना शमशेर की कविता को छूने का साहस नहीं जुटा पाई।’
सन्दर्भ सूची
1. शमशेर बहादुर सिंह - प्रतिनिधि कविताएँ, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, नामवर सिंह द्वारा लिखित भूमिका से उदधृत
2. प्रभाकर श्रोत्रिय - कवि परम्परा-तुलसी से त्रिलोचन, भारतीय ज्ञानपीठ नई दिल्ली, दूसरा संस्करण 2008, पृष्ठ-168
3. अशोक बाजपेयी - कवि कह गया है, भारतीय ज्ञानपीठ
दिल्ली, सं0 - 2000, पृष्ठ-48
4. मलयज - शमशेर और आधुनिक कविता
5. संपादक-नामवर सिंह, मलयज की डायरी
भाग-2, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली,
प्रथम सं0-2000, पृष्ठ-443
6. डॉ. रामदरश मिश्र - हिंदी कविता: आधुनिक आयाम, पृष्ठ - 111
7. विजयदेव नारायण साही,छठवाँ दशक,हिंदुस्तानी एकेडमी इलाहाबाद, द्वितीय सं0-2007, पृष्ठ 203
8. संपादक-विश्वनाथ तिवारी, आठवें दशक की हिंदी
कविता, पृष्ठ - 127
9. कुंअर नारायण - आज और आज से पहले, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, संस्करण-1998
10. रामस्वरूप चतुर्वेदी - हिंदी काव्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन इला0, सं0-2007, पृ0-273
11. शमशेर बहादुर सिंह - उदिता, वाणी प्रकाशन दिल्ली, प्रथम सं0-1980, पृष्ठ - 23
12. बच्चन सिंह - हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण प्रकाशन नई दिल्ली, संशोधित संस्करण-2006, पृ0-434
13. विष्णु चंद्र शर्मा - काल से होड़ लेता शमशेर, संवाद प्रकाशन मुंबई, सं0-2006, पृ0-84
14. रामविलास शर्मा-नयी कविता और अस्तित्ववाद,राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, सं0-1993, पृ0-90
15. नामवर सिंह - आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ, लोकभारती प्रकाशन इला0,सं0-2005, पृ0-118
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें