बुधवार, 20 मई 2020

LLC, Juthan, जूठन


जूठन (ओमप्रकाश वाल्मीकि)
डॉ. अवधेश पाण्डेय


आत्मकथा

जूठन एक दलित आत्मकथा है। इसका प्रकाशन 1997 में हुआ था। जब कोई व्यक्ति अपने जीवन के अनुभवों को सिलसिलेवार ढंग से लिखता है तो उसे आत्मकथा कहा जाता है। आत्मकथा लेखक स्वयं लिखता है। इसमें वह अपने जीवन के अच्छे-बुरे अनुभवों को लिखता है। आत्मकथा में बताई गई घटनाएं लेखक का खुद का भोगा हुआ सत्य होता है इसलिए आत्मकथा कोई झूठी कहानी या गल्प नहीं होती। यह अनुभव के तराजू पर तौला हुआ खरा सोना होती है। आत्मकथा वही लिखता है जिसके पास कहने के लिए कुछ खास होता है। जूठन का प्रकाशन हिंदी साहित्य की एक क्रांतिकारी घटना है। इसने हिंदी दलित साहित्य को एक गति एवं दिशा दी। जूठन हिंदी की सबसे प्रसिद्ध दलित आत्मकथा है।

दलित कौन?

सामान्य रूप से एस.सी. कटेगरी में आने वाले लोगों को दलित कहा जाता है। गांधी जी ने इस वर्ग के लोगों को हरिजन कहा था। दलित शब्द का अर्थ है - शोषित, वंचित, पीड़ित, मसला हुआ, कुचला हुआ, दमित व्यक्ति जिसे विकास के उचित अवसर नहीं दिए गए हों। इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत की आधी से अधिक आबादी दलित है। लेकिन दलित विमर्श में दलित शब्द इतना व्यापक नहीं है। यहां दलित का अर्थ है - जाति अथवा वर्ग के आधार पर बनी वर्णव्यवस्था में सबसे नीचे आने वाली जातियां जिन्हें शूद्र कहा जाता है और जिनके साथ अस्पृश्यता का व्यवहार होता है। धीरे-धीरे दलित शब्द उन जातियों के अर्थ में रूढ होता गया जिन्हें पहले अछूत या हरिजन कहा जाता था। इसके लिए कानूनी  शब्द अनुसूचित जाति है। ज्योतिबा फूले ने कहा है, ‘गुलामी की यातना को जो सहता है, वही जानता है और जो जानता है, वही पूरा सच कह सकता है। सचमुच राख ही जानती है जलने का अनुभव और कोई नहीं।‘

ओमप्रकाश वाल्मीकि


ओमप्रकाश वाल्मीकि का जन्म 30 जून 1950 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर जिले के बरला गांव में 30 जून 1950 को हुआ था। जूठन में वाल्मीकि जी ने अपनी कहानी के माध्यम से सदियों से वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था के बंधनों में बंधे पूरे दलित समाज की कथा को कहा है। जन्म पर किसी मनुष्य का अधिकार नहीं है। यह एक नैसर्गिक प्रक्रिया है लेकिन यह जातिगत व्यवस्था जन्म के आधार पर एक को श्रेष्ठ तो दूसरे को अछूत ठहराती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ने इसी अतार्किक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाया है।
ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं - ‘दलित जीवन की पीड़ाएं असहनीय और अनुभव-दग्ध हैं।...एक व्यवस्था में हमने सांसे ली है जो बेहद क्रूर और अमानवीय है। दलितों के प्रति असंवेदनशील भी...काफी जद्दोजहद के बाद मैंने लिखना शुरू किया। तमाम कष्टों, यातनाओं, उपेक्षाओं को फिर से जीना पड़ा। उस दौरान गहरी मानसिक यंत्रणाएं मैंने भोगी। स्वयं को परत-दर-परत उधेड़ते हुए कई बार लगा-कितना दुखदायी है यह सब!’
जूठन दिल दहला देने वाली एक दलित लेखक की सच्ची कहानी है। आत्मकथा में वाल्मीकि ने जिन दो पहलुओं को बड़ी सूक्ष्मता से उकेरा है। वह है उनका बचपन और उनकी शिक्षा। अपने बचपन के बारे में वे लिखते हैं -
तंग गलियों में घूमते सूअर, नंग-धड़ंग बच्चे, कुत्ते, रोज मर्रा के झगड़े, बस यह था वह वातावरण जिसमें बचपन बीता। इस माहौल में यदि वर्ण व्यवस्था को आदर्श कहने वालों को दो-चार दिन भी रहना पड़ जाए तो उनकी राय बदल जाएगी।
जिन विपरीत हालातों में बालक ओमप्रकाश की शिक्षा हुई। वह सारी व्यवस्था को लाकर कटघरे में खड़ा कर देती है। इनको बड़ी कठिनाई से बरला इंटर कॉलेज बरला में प्रवेश मिला था। वहां के गुरु लोग कोई न कोई बहाना करके इनको क्लास से बाहर निकाल देते थे और पूरे स्कूल परिसर में झाडू लगवाते थे। कुछ बोलने पर कहते थे - अबे चूहड़े के, दो अच्छर पढ़ क्या लिए दिमाग चढ़ गया। औकात मत भूल! इसलिए यह लिखते हैं कि जब भी कोई आदर्श गुरु की बात करता है तो मुझे वे तमाम शिक्षक याद आ जाते थे जो मां बहन की गालियां देते थे। स्कूल के हैंडपंप को भी इनको छूने की अनुमति नहीं थी। इन्हें तब तक इंतजार करना पड़ता था जब तक कोई अन्य ऊंची जाति का विद्यार्थी न आ जाए। वह हैंडपंप चलाता था तो वह पानी पी लेते थे लेकिन हैंडपंप को छू नहीं सकते थे

जूठन का नामकरण


     इस रचना का जूठन नाम राजेन्द्र यादव ने दिया है। रचनाकार की मां तगाओं के घर से जूठन लेने जाती थी और उसे ही इनका परिवार खाता था। एक बार जूठी पत्तलों को एकत्र करते समय उन्होंने चौधरी से कहा कि सभी लोग खाना खा चुके हैं। जूठन तो मैं एकत्र ही कर रही हूं; हमें एक पत्तल साफ भोजन बच्चे के लिए मिल जाए तो बहुत ही अच्छा होगा। चौधरी ने साफ शब्दों में कह दिया - ...अपणी औकात में रह चूहड़ी। उठा टोकरा दरवाजे से और चलती बन...! रचनाकार की मां ने गुस्से में सारा टोकरा वहीं पलट दिया और कहा इसे सुबह बरातियों को नाश्ते में खिला देना। और पैर पटकते हुए चली गई। इसी घटना के कारण इस इस आत्मकथा का नाम ‘जूठन’ रखा गया।

सविता प्रसंग
(लेखक की अधूरी प्रेम कहानी)

     8 जुलाई 1970 की शाम वे आर्डिनेंस फैक्ट्री में ट्रेनिंग के लिए अंबरनाथ छात्रावास पहुंचे। वहां इनके साफ-सुथरे आचरण के कारण लोग इन्हें महर्षि कहने लगे। धीरे-धीरे इनकी नजदीकी वहीं रहने वाले एक कुलकर्णी ब्राह्मण परिवार से हो गई। कुलकर्णी की छोटी बेटी सविता लेखक की हम उम्र थी। इसलिए वह लेखक की तरफ आकर्षित होने लगती है। शायद कुलकर्णी परिवार वाल्मीकि सरनेम के कारण ओमप्रकाश को ब्राह्मण समझता है। लेखक कुलकर्णी परिवार के घर भी जाता रहता है और घर भोजन भी करता है। इसी बीच एक दिन कुलकर्णी परिवार में प्राध्यापक कांबले आते हैं। कांबले महाराष्ट्र के दलित होते हैं। कुलकर्णी परिवार उन्हें अलग कप में चाय देता है। यह देखकर लेखक का मन दुखी हो जाता है। लेखक समझ गया था कि उस परिवार में अवर्णों को अछूत माना जाता है। फिर लेखक तय करता है कि वह अपनी जाति के बारे में सविता को बताकर रहेगा।
     वह सविता से मिलता है और पूछता है कि उस दिन प्राध्यापक कांबले को अलग कप में चाय क्यों दी गई थी। सविता ने कहा- अच्छा वह एस.सी.। वह कहती है कि हमारे घर में जितने भी एस.सी. और मुसलमान आते हैं; उन सबके लिए अलग बर्तन है। जब ओमप्रकाश वाल्मीकि ने बताया कि वह खुद एस.सी. हैं तो यह सुनकर सविता को काफी दुख हुआ। वह रोने लगी और इस तरह उनका संबंध बनने से पहले ही टूट गया। हजारों साल की नफरत उनके बीच दीवार बनकर खड़ी हो गई।
     वाल्मीकि जी ने जाति छुपाकर सम्मान पाने वालों की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने लिखा है कि इससे कुछ समय के लिए तो सम्मान मिल जाता है लेकिन भेद खुल जाने का खटका हमेशा बना रहता है। यह रचना जातिगत मान-सम्मान के प्रश्नों पर विचार करती है। जाति की खरोंचें जल्दी नहीं मिटती। यह रचना निम्न वर्ग की पीड़ा और उसके आक्रोश को व्यक्त करती है।
     इस आत्मकथा में वाल्मीकि जी लिखते हैं, मैं इस गंदगी से निकल आया हूं लेकिन लाखों लोग आज भी उस घिनौनी जिंदगी को जी रहे हैं। देश को आजाद हुए आज छह दशक हो चुके हैं पर एक बड़े तबके के लिए शांत और खुशहाल जीवन आज भी दूसरे लोक की कथा है। जूठन इन्हीं समस्याओं से टकराती है।

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